*रमज़ान से मुताल्लिक़ कुछ अहादीस।*

*रमज़ान से मुताल्लिक़ कुछ अहादीस।*
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1) *जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ और सवाब की निय्यत से रखा उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे*.

आप ﷺ ने फ़रमाया के जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ और सवाब की निय्यत से रखा  उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे
📚  (सहीह बुख़ारी  #1901)

2) *जो रोज़े की हालात में झूठ बोलना और दगा बाज़ी करना न छोड़े तो अल्लाह को ऐसे रोज़े की कोई ज़रूरत नही हैं.*

रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया अगर कोई शख़्स (रोज़े रख कर भी) झूठ बोलना और दगा बाज़ी करना नहीं छोड़े तो अल्लाह तआला को इसकी कोई ज़रूरत नही के वह अपना खाना पीना छोड़ दे. 
📚 [सहीह बुख़ारी #1903]

3) *रोज़े में भूलकर खा -पी लेने से रोज़ा नही टूटता. क्योंकि उसको भूल में अल्लाह ने खिलाया है.*

अल्लाह के रसूल ﷺ  ने फ़रमाया जिसने भूल कर रोज़े की हालत में कुछ खा पी लिया तो वह अपना रोज़ा पूरा करे क्योंकि उसे तो अल्लाह ने खिलाया पिलाया है. 
📚[सहीह बुख़ारी : 6669]

4) *रोज़ेदार के लिए जन्नत (jannat) में एक अलग दरवाज़ा है जिससे सिर्फ रोज़ेदार दाख़िल होंगे.*

रसूलुल्लाह ﷺ  ने फ़रमाया जन्नत का एक दरवाज़ा  है जिसको रय्यान कहते है, क़यामत के दिन उस दरवाज़े से सिर्फ रोज़ेदार ही दाख़िल होगे और उसके दाख़िल होने के बाद यह दरवाज़ा बंद हो जायेगा.
  📚 [सहीह बुखारी #1896 ]

5) *जब तुम रोज़े से हो और कोई लड़ना चाहें या गाली दे तो जवाब में कह दो कि मैं रोज़े  से हूँ.*

*रोज़ेदार के मुँह की बू अल्लाह के नज़दीक खुशबू  से भी ज़्यादा पसंदीदा है-*

👉 रसूल अल्लाह ﷺ  ने फ़रमाया  अल्लाह पाक फरमाता है कि आदम की औलाद का हर नेक अमल खुद इसी के लिए है मगर रोज़े खास मेरे लिए हैं और में ही इसका बदला दूंगा और रोज़े गुनाहों की एक ढाल हैं. अगर कोई रोज़ से हो तो उसे परेशान ना करे और ना शोर मचाये, अगर कोई शख्स इसको गाली दे या लड़ना या चाहे तो इस का जवाब सिर्फ यह हो के मैं एक रोज़ेदार आदमी हूँ. इस ज़ात की कसम जिसके हाथ में मुहम्मद ﷺ की जान है ,रोज़ेदार के मुँह की बू अल्लाह तआला  के नज़दीक मुश्क (कस्तूरी) की खुश्बू से भी ज़्यादा पसंदीदा है. रोज़ेदार को दो खुशियाँ हासिल होंगी (एक तो जब) वह इफ़्तार करता हैं तो खुश होता है और (दूसरा) जब वह रब से मुलाक़ात करेगा तो अपने रोज़ का सवाब पा कर खुश होगा .               
📚 [सहीह बुख़ारी #1904]

6) *रमज़ान में उमरह करना रसूल अल्लाह ﷺ के साथ हज करने के बराबर है*.
📚   (Sahi bukhari1863)

7) *उल्टी  हो जाने से रोज़ नही टूटता*.

📚 (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा # 9188)

8) *ग़ुस्ल वाजिब होने की हालत में (नापाक हो जाने पर) बिना ग़ुस्ल सेहरी करने में कोई हर्ज नहीं है*
*लेकिन फ़ज्र की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल ज़रूर कर लिया जाए.  
📚 (सहीह बुख़ारी # 1925, 1926)

9) *मुसाफ़िर के लिए रोज़े का क्या हुकुम है।*

क़ुरआन  :-  जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दीगर (रमज़ान के बाद) दिनों में जितने रोज़े क़ज़ा हुए हो गिन के रख ले. 

10) मुसाफ़िर चाहे तो रोज़ा तोड़ सकता है लेकिन उस रोज़े को उसको बाद में रख कर पूरा करना होगा. 
📚  [सूरह बक़रह आयत 184]

11) *रोज़े की हालत में आँख / नाक या कान में दवा डालने से बचना चाहिए.*

रोज़े की हालत में आँख या कान में दवा डालने से बचना चाहिये. क्योंकि इसका ताल्लुक़ (कनेक्शन) हलक़ से होता है.  इब्न अब्बास (RA) फ़रमाते है कोई चीज़ दाख़िल हो जाये तो रोज़ा टूट जाता है और निकलने से नही टूटता.

📚  (अल औसत इब्न मुन्ज़िर 1/185)(सहीह बुखारी #1938)

12) *अगर खाते  हुए सेहरी का वक़्त खत्म होने का इल्म हो जाए तो क्या करे?*

अल्लाह के रसूलुल्लाह ﷺ  ने फ़रमाया  जब तुममें से कोई अज़ान सुनेऔर (पीने का ) बर्तन उसके हाथ में हो तो उस बर्तन को न रखे बल्कि इससे अपनी हाजत के मुताबिक खा पी ले.
मतलब यह कि उसको जल्द खा ले (छोड़े नही)
📚[सहीह अल जामिअ #607, अस सहीहा #1394]

13) रोज़े की हालत में ज़रूरत पड़ने पर खून निकाला जा सकता है और दांत भी निकाला जा सकता है, लेकिन कमज़ोरी  हो जाने का डर हो तो ऐसा न करे.

रोज़े की हालत में इंजेक्शन भी लगवाया जा सकता है लेकिन वह इंजेक्शन ताक़त का न हो बल्कि बीमारी का हो.    
    📚 [सहीह बुख़ारी :1938-1940]

14) लैलतुल-क़द्र (शबे क़द्र) और उसकी कुछ फ़ज़ीलत
लैलतुल-क़दर रमज़ान के आख़िरी अशरे (दस दिनों) की ताक़ रातो में से एक है. रसूलल्लाह ﷺ   ने फ़रमाया  इसको आख़िरी  अशरे की ताक रातो (21,23,25,27,29) में तलाश करो.   
📚 ( सहीह बुख़ारी #2016)

*क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया हमने (इस क़ुरआन) को शबे क़द्र में नाज़िल (करना शुरू) किया. और तुमको क्या मालूम शबे क़द्र क्या है. शबे क़द्र (मरतबा और अमल में) हज़ार महीनो से बेहतर है. इस (रात) में फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाज़िल होते हैं. ये रात सुबह के तुलूअ होने तक  सलामती है.*
📚[सूरह क़द्र आयत 1-5]

रसूलल्लाह ﷺ  ने फ़रमाया  *जिसने लैलतुल-क़द्र का क़ियाम ईमान के साथ और सवाब की निय्यत से किया तो उसके पिछले (छोटे) गुनाह माफ़ कर दिया जाएंगे.*
   📚[सहीह मुस्लिम #1781]

इस रात में क़ुरआन नाज़िल किया गया है. यह रात हज़ार महीनों से बेहतर है. लिहाज़ा जिसने इस रात की इबादत को पा लिया उसने हज़ार महीनों से भी ज़्यादा इबादत को पा लिया. इस रात में फ़रिश्ते अपने सरदार हज़रत जिब्राइल (अस) के साथ नाज़िल होते है जो रहमत और बरकत की अज़ीम निशानी है. इस रात में  सरासर सलामती है इस रात में पूरे साल की तक़दीर या तमाम मालूमात, साल के फैसले लौहे महफ़ूज़ से निकल कर फ़रिश्तो को सौप दिया जाता है.   
📚[सूरह दुख़ान 1-4 ]

15) *लैलतुल-क़द्र (शबे क़द्र) की रात की दुआ क्या  है.*            
         
*اللهم إنك عفو كريم تحب العفو فاعف عن*
                                                          
अल्लाह तू माफ़ी और दरगुज़र करने वाला मेहरबान है और माफ़ी और दरगुज़र करने को पसंद करता है इसलिए तू हमे माफ़ और दरगुज़र कर दे. 
                    
📚[तिर्मिज़ी:3513]

16) *ज़कात -उल-फ़ित्र किस पर फ़र्ज़ है?*

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि फ़रमाते अल्लाह कि रसूल अल्लाह ﷺ  रमज़ान में ज़कात -उल-फ़ित्र को हर मुसलमान चाहे वह आज़ाद हो या गुलाम ,मर्द हो या औरत छोटा हो या बड़ा सब पर फ़र्ज़ किया है.
   📚[सहीह बुख़ारी #1503]

17) *इफ़्तार करने की दुआ सुन्नत से साबित नही है, सिर्फ़ बिस्मिल्लाह करके इफ्तार शुरू करे, हाँ इफ़्तार शुरू करने के बाद की दुआ का सुबूत मिलता है.*

18)  *इफ़्तार के बाद की दुआ.*

👈 *ذَھَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوْقُ وَثَبَتَ الْاَجْرُ اِنْ شَآئَ اللّٰہُ*
ज़ह्बज्ज़मा  वब्तल्लतिल ऊरुक़ु व सबतल अज्रो इंशाअल्लाह

दुआ की मानी :-  (प्यास चली गयी और रगे तर हो गयी और अगर अल्लाह ने चाहा तो अजर साबित हो गया ) 
📚 (अबू दावूद #2357)

19) *रोज़े की निय्यत का क्या मामला है ?*

👉 ज़बान से निय्यत करने का कोई सुबूत न तो खुद रसूलुल्लाहﷺ  से मिलता  है और न ही  किसी सहाबी, ताबई या किसी भी इमाम वगैरह से. यह सच है कि अमल की बुनियाद निय्यत होती है लेकिन निय्यत दिल के इरादे का नाम है न कि ज़बान से दुहराने का.
📚 [सहीह बुखारी #1]

*और निय्यत तो सेहरी खाते वक्त ही हो जाती है कि रोज़ा रखना है. बल्कि रात में सोते वक़्त ही हम इस निय्यत से सोते हैं कि कल सहरी में उठना है, बस यही काफ़ी है.*

रोज़े की *निय्यत की दुआ का कोई सुबूत क़ुरआन और सहीह हदीस से नहीं मिलता है इसीलिए हमे भी कोई दुआ नही पढनी चाहिए.*

👉 रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया :- *जिसने हमारे इस दीन में कुछ ऐसी बात शामिल की जो उसमे से नहीं है तो रद (क़ाबिले क़ुबूल नही) है. 
  📚 [सहीह बुख़ारी #2697 ]

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