Eid इदुल अज्हा के अहकाम और मसाईल कुरआनो हदीस की रौशनी में*

Eid इदुल अज्हा के अहकाम और मसाईल कुरआनो हदीस की रौशनी में*
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*तकबीरात* :-  तकबीर, तहलील और तहमीद, यानि अल्लाह तआला की बडाई व बुजुर्गी ब्यान करना, उसको एक मानना और उसकी तारीफ़ ब्यान करने को कहते हैं।
अश्रह ज़िलहिज़्जा में "अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर लाइलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर वलिल्लाहिल हम्द"(दार कुतनी) 
पढने की खास ताकीद की गई है। (मुसनद अहमद)
 इन तकबीरों को ज़िलहिज़्जा (बकरीद) का चांद नज़र आने के बाद से 13 जिलहिज़्जा के सूरज छुपने तक चलते-फ़िरते, उठते-बैठते और नमाज़ों के बाद पढते रहना चाहिये। (बुखारी, मिरआत शरह मिश्कात)

कुछ उलमा ने लिखा है की तकरीबात 9 जिलहिज़्जा की फ़ज़्र से 13 जिलहिज़्जा की नमाज़ अस्र तक पढनी चाहिये, इस बारे सहाबा किराम (रज़ि.) के तौर-तरीके हदीस की किताबों में मिलते हैं मगर बेहतर और अफ़ज़ल सूरत यही है की ज़िलहिज़्जा का चांद नज़र आने के बाद से 13 ज़िलहिज़्जा के सूरज छुपने तक तकरीबात पढें क्यौंकि ज़्यादातर सहाबा किराम (रज़ि.) का अमल यही मिलता है और इस सूरत पर अमल करने में तमाम बातों और तरीकों पर अमल भी हो जाता है।

*चादं दिखने के बाद बाल और नाखुन ना काटें*  
ये वो सुन्नत है जिस पर कोई अमल नही करता अल्लाह के रसुल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इससे सख्त मना फ़रमाया है। चांद दिखने के बाद बाल और नाखुन नही काटने चाहिये चाहे आप कुर्बानी कर रहे हो या नही। कुर्बानी के बाद बाल और नाखुन काटने पर हर बाल और नाखुन पर एक कुर्बानी का सवाब मिलता है।

*नफ़ली रोज़े* :
अशरह जिलहिज़्जा में नफ़ील रोज़ों की भी फ़ज़ीलत साबित है। (अबू दाऊद, निसई, इब्ने माज़ा) 
और खास तौर पर ज़िलहिज़्जा की नवीं तारीख के रोज़े का बहुत ज़्यादा सवाब है(मुस्लिम, अबू दाऊद, निसई) 
जो लोग हज के लिये 9 तारीख को अरफ़ात में हों, उन्हे 9 तारीख का रोज़ा रखना मना हैं। (बुखारी, मुस्लिम)

*ईदुल अज़हा के दिन की सुन्नते*
ईदुल अज़हा (बकरीद) के दिन सुबह सवेरे गुस्ल करना बेहतर है (बैहकी) हैसियत के मुताबिक अच्छे कपडे पहनना (बुखारी व मुस्लिम)
और खुश्बु लगाना सुन्नत है। (हाकिम)
नमाज़ ईदुल अज़हा से पहले कुछ भी ना खाना सुन्नत है। (तिर्मिज़ी) 
नमाज़ खुले मैदान में अदा करनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम) 
नमाज़ के लिये निहायत सुकून व वकार के साथ ऊंची आवाज़ से तकबीरात पढते हुए जाना चाहिये (बैहकी)नमाज़े ईद में औरतों को भी शरीक होनी ज़रुरी है। अगर कुछ औरतें हैज़ (मासिक धर्म) आने की वजह से नमाज़ न पढ सकें तो अलग बैठ जायें और लोगों की तकबीरों के साथ दुआऐं मांगती रहें।(बुखारी व मुस्लिम)
 नमाज़ ईद का पसंदीदा वक्त इशराक यानि सूरज निकलने के फ़ौरन बाद का है।(अबू दाऊद)
 ईद की नमाज़ बगैर अज़ान व इकामत के पढनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम)

*तरीका नमाज़*: 
  नमाज़ ईद दो रकअत है(बुखारी)
 पहली रकअत में तकबीर तहरीमा (अल्लाहुअकबर) के बाद सात तकबीरें कहनी चाहियें और दूसरी रकअत में किरअत शुरु करने से पहले पांच तकबीरें कहनी चाहियें (तिर्मिज़ी, इब्ने माज़ा, इब्ने खुज़ैमा, दार कुतनी) 
बाकी नमाज़ आम नमाज़ों की तरह अदा की जाये। ईद की नमाज़ में सुन्नत यह है कि पहली रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह अअला या सूरह काफ़ पढी जाये और दुसरी रकअत में सूरह गाशिया या सूरह कमर पढी जाये। (मुस्लिम, तिर्मिज़ी)
कुछ लोग नमाज़ शुरु करने से पहले नमाज़ ईद की नियत करने का तरीका बताते हैं जो इस तरह होता है, "नियत करता हूं नमाज़े ईद, वास्ते अल्लाह तआला के मय ज़ायद तकबीरों के पीछे इस इमाम के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहुअकबर" नियत का यह तरीका पूरी तरह बिदअत है। दुनिया में मौजुद तमाम हदीसों की किताबों में से किसी में भी इस तरह से नमाज़ की नियत करने का तरीका नहीं मिलता है। इसलिये इस तरीके को फ़ौरन छोड देना चाहिये क्यौकि नियत तो दिल के इरादे का नाम है। (तफ़सील के लिये देखिये उम्दतुर्रेआया हाशिया शरह वकाया जिल्द 1 पेज 159)
और फ़िर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान है कि "दीन में नई बात पैदा करना बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है और गुमराही जहन्नम का रास्ता है।"(खुतबातुल हाजा)

*खुतबा* :       
नमाज़ के बाद तमान लोग अपनी नमाज़ की सफ़ों में बैठे रहें (बुखारी व मुस्लिम) 
इमाम अपनी नमाज़ की जगह पर खडे होकर खुतबा दे जिसमें नसीहत और दीन की ज़रुरी बातें बताये। (बुखारी व मुस्लिम) 
ईदगाह से घर वापस होते हुए रास्ता बदलना सुन्नत है। (बुखारी)

*कुरबानी की ताकीद:*    नमाज़ ईदुल अज़हा से फ़ारिग होने के बाद कुर्बानी करनी चाहिये।(बुखारी व मुस्लिम)
कुर्बानी हर उस शख्स पर वाजिब और ज़रुरी है जो जानवर खरीदने की ताकत रखता हो। कुर्बानी करने के लिये साहिबे निसाब (साढे सात तोला सोना या साढे बावन तोला चांदी या उतने पैसे का मालिक) होने की शर्त लगाना बेदलील बात है। नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फ़रमान है "जो शख्स कुर्बानी की ताकत रखता हो फ़िर भी ना करे वह हमारी ईदगाह के करीब भी न आयें" (इब्ने माज़ा, मुस्नद अहमद, दार कुतनी)

*कुरबानी का जानवर कैसा हो?*
: कुर्बानी का जानवर खरीद्ते वक्त इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि जानवर मोटा-ताज़ा और खूबसुरत हो। (अबू दाउद, निसई, तिर्मिज़ी वगैरह)
और उसके कानों, आखों और सींगों को अच्छी तरह देख लेना चाहिये। (इब्ने खुज़ैमा, हाकिम)

*कुरबानी का वक्त:*  कुरबानी का सही वक्त ईद की नमाज़ के बाद से शुरु हो जाता है, नमाज़ ईद से पहले की गई कुर्बानी, कुर्बानी नही है(बुखारी) 
कुछ लोगों ने देहात वालों को नमाज़ ईद से पहले कुर्बानी की इजाज़त दी है यह बिल्कुल गलत है अल्लाह के दीन में दखल देना है और रसूलल्लाह के हुक्म के खिलाफ है तौबा करनी चाहिए

*कुर्बानी करने का दिन*
: सही हदीसों और सहाबा किराम के अमल की रौशनी में कुर्बानी करने का दिन ईद के दिन सबसे बेहतर और उसके बाद तीन दिन तक दुरुस्त है यानि 13 जिलहिज़्ज़ा तक कुर्बानी की जा सकती है। (तफ़सील के लिये देखें मुसनद अहमद, दार कुतनी, सहीह इब्ने हिब्बान, बयहकी, नैलुल औतार, और तफ़सीर इब्ने कसीर)

*कुर्बानी का तरीका*
: कुर्बानी का जानवर अपने हाथ से ज़िबह करना पसंदीदा अमल है। (मुस्लिम, अबू दाऊद)
औरतों के लिये भी यही हुक्म है। (बुखारी)
 जानवर को ज़िबह करने से पहले छुरी खूब तेज़ कर लेनी चाहिये। (अबूदाउद, मुसनद अहमद) 
इस बात का ख्याल रखना भी ज़रुरी है कि छुरी जानवर के सामने या उसे लेटा कर तेज़ नही करनी चाहिये, बल्कि ये काम उसकी निगाहों से दूर रह कर करना चाहिये। (हाकिम, अल्मुअजमुल कबीर लिलतबरानी, मजमउल ज़वाइद) 
बकरा, बकरी, भेड, दुंबा, और भैंस को किबला की तरफ़ मुंह करके ज़िबह करने का तरीका यह है कि उसके ऊपर वाले पहलू पर अपना पांव रखकर ज़िबह करना चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम)
 और ऊंट को किबला रुख खडा करके बाई टांग और रान को साथ बांधकर तीन टांगो पर खडा होने की हालत में उसके सीने और गर्दन की जड के बीच गढ्ढा नुमा जगह में भाले या कोई तेज धारदार हथियार से दुआ पढकर मारा जाये जिससे उसकी खुन की नली कट जाये, उसे "नहर" करना कहते हैं। (सुरह हज.आयत. ३६, बुखारी व मुस्लिम)

*कुर्बानी की दुआ*
:  इन्नी वज्जहतु............दुआ पढने वाली हदीस को मुहददिसीन (हदीसें जमा करने वालों) ने ज़ईफ़ (कमज़ोर) कहा है। (देखें "ज़ईफ़ सुनन अबी दाऊद", "तर्जुमान" जनवरी 2004 पेज 16)

कुर्बानी का जानवर ज़िबह या नहर करते वक्त नीचे लिखी दुआ पढनी सुन्नत है।
"बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी"

तर्जुमा :- मैं अल्लाह तआला के नाम से (ज़िबह करता हूं) अल्लाह सबसे बडा है, ऐ अल्लाह! (इसे) मेरी तरफ़ से तू कुबूल फ़र्मा। (हिस्नुल मुस्लिम)

अगर कुर्बानी अपने और अपने घरवालों की तरफ़ से है तो कहना चाहिये   :-  "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी व अहलेबयती"  और अगर दूसरे की तरफ़ से है तो कहना चाहिये :- "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन............" के बाद उसका नाम लें और "बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर" कह कर ज़िबह या नहर करना चाहिये (बुखारी व मुस्लिम)

ज़िबह के बाद की मनघडंत दुआ : कुछ हज़रात ने लिखा है कि ज़िबह करने के बाद यह दुआ पढनी चाहिये :
"अल्लाहुम्मा तकब्बलहू मिन्नी कमा तकब्बल्ता मिन हबीबिका मुह्म्मदिऊं व खलीलिका इब्राहिमा अलैहिस्सलाम"  यह दुआ मनघंडत है। हदीस की किसी किताब में नही लिखी है। मुसलमानों को नबी की सुन्नत पर अमल करना चाहिये लोगों बनाई हुई बातों से बचना चाहिये।

(नोट : कुछ लोग कुर्बानी नहीं करते बल्कि उसकी जगह कुर्बानी की रकम गरीबों में तकसीम करना अच्छा समझते है। यह अमल बिल्कुल शरीअत के खिलाफ़ है, इससे बचना चाहिये।)

*कुर्बानी की खाल*
:  कुर्बानी के जानवर की खालें सदका कर देनी चाहियें यानि गरीब, मोहताज, यतीमों और बेवांओं को दे देनी चाहियें (बुखारी व मुस्लिम)
 कुर्बानी की खाल अपने इस्तेमाल में भी लाई जा सकती है। (मुस्नद अहमद) 
कुर्बानी की खाल बेचकर उसकी कीमत को अपने खर्च में लाना जाइज़ नही हैं। (मुस्नद अहमद)
इसी तरह कुर्बानी की खाल कस्साब (कसाई या काटने वाला)को मज़दूरी के बदले देना भी जाइज़ नहीं हैं। (बुखारी व मुस्लिम) 
बल्कि कस्साब (कसाई या काटने वाला) को उसकी मज़दूरी अपने पास से देनी चाहिये। (बुखारी व मुस्लिम)

*कुर्बानी का गोश्त*
:   कुर्बानी के गोश्त में से खुद खायें और दुसरों को भी खिलायें। कुरआन मजीद सुरह हज की आयत 28 में अल्लाह तआला फ़रमाता है : "इसमें से तुम कुछ खाओ और खस्ताहाल मोहताजों को खिलाओ" और आयत 36 में अल्लाह तआला फ़रमाता है "इसमें से तुम लोग कुछ खाओ और कनाआत करने वालों (थोडे में खुश हो जाने वाले) और हाथ फ़ैलाने (मांगने) वालों को खिलाओं"। रसूलुल्लाह सल्लाल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : "खुद खाओ, रखो, और सदका करों" (बुखारी व मुस्लिम)
इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि जिन इलाकों में हैसियत वाले लोग ज़्यादा हों वहां तो जितने दिन चाहें कुर्बानी का गोश्त रखकर खायें लेकिन जहां फ़कीर, गरीब, और मौहताज वगैरा ज़्यादा हों जो कुर्बानी नहीं कर सकते हों, वहां कुर्बानी करने वालों को गोश्त जमा करने के बजाये यह कोशिश करनी चाहिये कि कुर्बानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे।
जजाकअल्लाह खैर

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