*मुसलमान क्यों ग़ैर-मुसलमानों को उनके त्यौहारों पर बधाई नहीं दे सकते?*
*मुसलमान क्यों ग़ैर-मुसलमानों को उनके त्यौहारों पर बधाई नहीं दे सकते?*
शब्दकोश के अनुसार "धर्म" का अर्थ होता है सर्वशक्तिमान नियंत्रित करने वाली ऊर्जा, विशेषत: ईश्वर या ईश्वरों में विशवास व उनकी पूजा करना!
इस्लाम के अनुसार इस ब्रम्हांड का निर्माता केवल एक सर्वशक्तिमान ईश्वर "अल्लाह" है, और केवल उसकी ही पूजा की जानी चाहिए व उसके बताए सिद्धान्तो के अनुसार इन्सान को अपना जीवन जीना चाहिए! उस एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने आपने नबियों व रसूलों के द्वारा जो नियम व सिद्धान्त इन्सान तक पहुँचाए, उनका नाम "इस्लाम" है, अरबी भाषा में जिसका अर्थ "शान्ती" और अपनी इच्छा को ईश्वर को सौंप देना होता है, और जो कोई ऐसा करता है अर्थात इस्लाम पर चलता है तो उसे "मुस्लिम" कहते हैं!
अल्लाह क़ु़रआन में फ़रमाता है:
_*"धर्म तो अल्लाह के निकट केवल इस्लाम ही है, और अहल-ए-किताब (यहूदी व ईसाईयों) ने इसके बाद मतभेदभाव किया कि (सत्य का) ज्ञान उनके पास आ चुका था! ऐसा उन्होंने आपस की ईर्ष्या के कारण किया! और जो अल्लाह की आयातों का इनकार करता है, तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेने वाला है!"*_
*[अल-क़ुरआन, सूरह आल-ए-इमरान 3:19]*
दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
_*"जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और धर्म तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा, और आख़िरत में वह घाटा उठानेवालों में से होगा!"*_
*[अल-क़ुरआन, सूरह आल-ए-इमरान 3:85]*
क़ुरआन की इन दो आयातों के अनुसार एक मुसलमान को इस बात पर ईमान लाना आवश्यक है कि ईश्वर के निकट सिर्फ़ इस्लाम ही सत्य धर्म है, और जो कोई इस्लाम के अतिरिक्त किसी और धर्म पर चलता है तो वह इन्सान का अपना घढ़ा हुआ है, जो आख़िरत (परलोक) में उससे कभी भी स्वीकार न किया जाएगा!
अब इस बात को स्वीकार करने के बाद यह प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि एक मुसलमान किसी को ऐसी बात पर बधाई दे जिसको वह ख़ुद स्वीकार न करता हो! जब कोई ग़ैर-मुस्लिम किसी और धर्म पर चलता है और उस धर्म के त्यौहारों को मनाता है तो उसका यह विश्वास होता है कि वह धर्म और त्यौहार सत्य हैं व ईश्वर की ओर से हैं!
इस ग़लती पर उसे बधाई देना ऐसे ही है कि किसी व्यक्ती को एक हानिकारक वस्तु का सेवन करने पर रोकने कि बजाये उल्टा शाबाशी दी जाए, जबकि आप ख़ूब जानते हों की वह वस्तु उसके लिए हानिकारक है! कोई भी ईमानदार व बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी ऐसा नहीं करेगा, और अगर वह ऐसा करता है तो या तो वह उस व्यक्ति को गुमराही में धकेलने का पाप कमाता है या वह पाखंडी है जो कहता कुछ और करता कुछ है!
एक मुसलमान पाखंडी व मुनाफ़िक़ नहीं होता, वह बाहर से भी वही होता है जो वह अन्दर से है! बजाये इसके की हम ख़ुद ग़ैर-मुसलमानों को उनके घढ़े हुए धर्मों के त्योहारों पर बधाई दें, अल्लाह क़ुरआन में हमें लोगों को सत्य-मार्ग अर्थात इस्लाम की ओर बुलाने का आदेश देता है:
_*"अपने रब के मार्ग की ओर हिकमत और अच्छी नसीहत के द्वारा बुलाओ, और उनसे ऐसे ढंग से तर्क-वितर्क करो जो सबसे उत्तम है!"*_
*[अल-क़ुरआन, सूरह अन-नहल 16:125]*
याद कर लीजिये, इस बात का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की इस्लाम हमें ग़ैर-मुसलमानों के साथ अच्छा व्यवहार व न्याय करने से रोकता है, बल्कि अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है:
_*"अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला! निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसन्द करता है!"*_
*[अल-क़ुरआन, सूरह मुम्तहिना 60:8]*
क़ुरआन की यह आयत अल्लाह के आख़िरी नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलयही व सल्लम पर अवतरित हुई थी, जिन्होंने कभी किसी ग़ैर-मुस्लिम पर ज़ुल्म व अन्याय न किया, और नाही भाईचारे के नाम पर उनको उनकी गुमराही व ग़लती पर कभी बधाई दी, बल्कि आपने हमेशा लोगों को उनकी भलाई के लिए सत्य-मार्ग की ओर बुलाया!
आज उस नबी का नाम लेने वाली यह उम्मत लोगों को सत्य की दावत देने के बजाये उल्टा ख़ुद उनकी गुमराही में उनका समर्थन करती नज़र आती है, और तर्क यह देती है कि वह भी तो हमें हमारे त्योहारों पर बधाई देते हैं तो हम क्यों उनको उनके त्योहारों पर बधाई न दें? तो याद कर लीजिये, सत्य और असत्य कभी बराबर नहीं होता, अगर कोई बिना सोचे समझे या समझ बूझ कर भी आपको आपके सत्य-धर्म इस्लाम में मनाये जाने वाले त्यौहारों पर बधाई देता है तो इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं कि आप भी उसको उसकी गुमराही पर बधाई दें, यह बिलकुल ऐसे ही है कि कोई शराबी आपको नमाज़ पढ़ने पर बधाई दे तो आप भी उसको शराब पीने पर बधाई दें, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी ऐसा नहीं करेगा!
अगर आप केवल इस्लाम ही को ईश्वर की ओर से अवतरित धर्म स्वीकार करते हैं और फिर भी ग़ैर-मुसलमानों को उनके त्योहारों पर बधाई देते हैं (बजाए इसके की आपका काम उनको अल्लाह की ओर बुलाना है) तो आप अपने दावे में झूठ बोलते हैं, बधाई देने का अर्थ है कि आप भी उस बात को मानते हैं, और अगर आपका तर्क यह है की आप उनको दिखाने के लिए बधाई देते हैं पर अन्दर से आप उनके त्योहारों को सही नहीं जानते तो ऐसे पाखंड (मुनाफिक़त) की इजाज़त इस्लाम हमें नहीं देता, बल्कि अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
_*"एक बन्दा बिना गंभीरता का अहसास किए अल्लाह को नाराज़ करने वाले ऐसे शब्द कहता जिनके कारण वह (जहन्नुम की) आग में फ़ेंक दिया जाएगा!"*_
*[सहीह अल-बुख़ारी, किताब-उर-रिक़ाक़, हदीस नं.6478]*
अल्लाह तमाम मुसलमानों को हिदायत अता फ़रमाए, आमीन!
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