बिदअत से दूरी ही कामयाबी है

बिदअत से दूरी ही कामयाबी है               (भाग-1)
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✅बिदअत का क्या अर्थ है और उसका हुक्म
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☑बिदअत काअर्थ किसी वस्तु का सर्व प्रथम अविष्कार अथवा नवाचार या प्रथम बार किसी नई वस्तु का बनाना है।बिदअत दो प्रकार के होती है  :-

1⃣बिदअत ,दुनिया के रहन- सहन क़े बारे में:-
■दुनिया में अगर किसी कार्य या वस्तु का प्रयोग किया जाता है- परन्तु  इसमें  किसी सवाब की आशा/इच्छा नहीं की जाती है तथा जब तक कि उसका इस्लाम की किसी मूल (बेसिक) आस्था से टकराव न हो तो ऐसे में नई वस्तु/कार्य का प्रचलन जाइज़ है।जैसे - कि आज के युग में दुनिया ने नई नई चीज़ें अविष्कार की हैं, परिवहन साधन,मोबाइल,रेफ्रिजरेटर,पंखे-कुलर, इत्यादि का प्रयोग।इसी तरह मस्जिद को पक्का सीमेंटेड करवाना या उसपर मार्बल लगवाना ,कालीन बिछवाना,मीनार तामीर करवाना,पंखे ,ट्यूब लाइट,ए.सी. आदि के प्रयोग से चुँकि किसी व्यक्ति की इबादत के सवाब में किसी कमीया बढ़ोतरी की गुंजाईश नहीं रहती है इसलिए यह दीन बिदअत नहीं कहलाएगी।मिसाल के तोर पर  किसी साधारण कमरेनुमा मस्जिद मेंजहा ऊपर उल्लेखित सुविधाए न हो के अंदर अथवा मस्जिद न होने की स्थिति में कोई जमात खुले आसमान के निचे कच्चे फर्श पर नमाज अदा करे तो उन व्यक्तियो को भी नमाज का उतना ही सवाब प्राप्त होगा जितना की सुविधायुक्त मस्जिद में प्राप्त होता,इसलिए इन दुनिवायी सविधाओं को दीन में बिदअत नहीं माना जा सकता।
2⃣बिदअत , दीन के बारे में :
■दीन में बिदअत की परिभाषाःशरीयत ए इस्लाम में प्रत्येक वह नया कर्म जिस के करने पर अल्लाह से सवाब (पुण्य) की आशा रखा जाए और वह कर्म नबी करीम ﷺ ने नहीं किया और न ही सहाबा (रज़ि0) ने किया हो तो वह बिदअत में शुमार होगा।इबादत तौक़ीफी है मतलब कि जिन इबादतों के करने का आदेश अल्लाह ने दिया हो या नबी करीम ﷺ की सुन्नत से प्रमाणित हो तो उन्हीं इबादतों को किया जाएगा। अपनी इच्छा या विद्वानों के इच्छानुसार इबादतें अल्लाह के पास अस्वीकृत है और इन्हीं इबादतों को बिदअत और पथभ्रष्टता में शुमार किया जाता है।

۞"हज़रत आयशा रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया –जिसने दीन मे कोई ऐसा काम किया जिसकी बुनियाद शरीअत मे नही वह मर्दुद ( rejected) है| "
📚सहीह बुखारी 2697

۞"हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रजि0 से रिवायत है कि - नबी  ﷺ ने फ़रमाया याद रखो बेह्तरीन बात अल्लाह कि किताब है और बेह्तरीन हिदायत मुहम्मद ﷺ कि हिदायत है और बद्तरीन काम दीन मे नया काम ईजाद करना है और हर बिदअत गुमराही हैं"
📚इब्ने माजा :45

■दीन-ए-इस्लाम में बिदअत को पसंद करने वालो ने अपनेगैर मसनून और बिदई कामो (बातो) को दीन की सनद दिलाने के लिए बिदअत को बिदअते हस्ना और बिदअते सय्या में बाट रखा है।हालांकि की रसूलुल्लाह ﷺ दीन के अंतर्गत आने वाली तमाम बिदअत को गुमराही करार दिया है।अपनी बातिल बात को सिद्ध करने के लिए हदीस गढ़ने वाले और रसूलुल्लाह ﷺ का नाम ले ले कर नए नए त्यौहार और नए नए रिवाज दीन ए इस्लाम में शुरू करने वाले व पहले से जारी रिवाजो जिनकी शरीयत में कोई हैसियत नहीं है की पैरवी करने वाले हजरात जरा इधर भी अपनी नजरे इनायत करे :-
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۞"हज़रत अबू हुरैरा रज़ि0 से रिवायत हैं के अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया – जिसने जानबूझ कर झूठ मेरी तरफ़ मंसूब किया वह अपना ठिकाना जहन्नम मे बना ले"
📚सहीह बुखारी :107
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