वित्र की नमाज पढ़ने का नबवी तरीका सहीह अस्नाद अहादीस की रौशनी में*

*वित्र की नमाज पढ़ने का नबवी तरीका सहीह अस्नाद अहादीस की रौशनी में*
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بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

*(1). वित्र का वक़्त:*

शेख मुहम्मद सालिह अल मुनज्जिद फरमाते है: वित्र की नमाज़ का शुरू का वक़्त तब होता है जब एक शख्स ईशा पढ़ चूका होता है अगरचे ईशा को मगरिब के साथ ही क्यों न पढ़ा गया हो मगरिब के वक़्त. और इस नमाज़ का ख़त्म होने का वक़्त फज्र से पहले है.

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

अल्लाह ने तुम पर एक नमाज़ मुक़र्रर की है जो वित्र है; अल्लाह ने तुम पर ये नमाज़ ईशा की नमाज़ और फज्र की शुरुआत के बीच मुक़र्रर की है.
📚-( जामेय तिर्मिज़ी, 425) अल-अल्बानी इन सहीह अल-तिर्मिज़ी.

*(2). वित्र क्या शुरू के वक़्त में पढ़ा जाये या आखिर के वक़्त में:*

नबी (ﷺ) ने फ़रमाया

जो शख्स आखिर रात में न उठ सके तो वो शुरू रात में वित्र पढ़ ले और जो आखिर रात में उठ सके वो आखिर रात वित्र पढ़े क्युकी आखरी रात की नमाज़ बेहतरीन है.
📚-(सहीह मुस्लिम, हदीस-755)

*(3). वित्र की नियत:*

नबी (ﷺ) ने फ़रमाया

तमाम अमल का दारोमदार नियत पे है
📚-(सहीह अल बुखारी, हदीस-1)

वज़ाहत: किसी भी नमाज़ के लिए नियत करना ज़रूरी है लेकिन नमाज़ की नियत दिल से न के ज़ुबान से की जाती है.

*(4). वित्र की रकत:*

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया

वित्र हर मुस्लमान का हक़ है. तो जो शख्स पांच रकत वित्र पढ़ना चाहे तो वो (पांच) रकत पढ़े और जो तीन रकत वित्र पढ़ना चाहे तो (तीन रकअत) पढ़े और जो कोई एक रकअत वित्र पढ़ना चाहे तो (एक रकअत वित्र) पढ़े.
📚-(सुनें अबू दाऊद, हदीस-1422,) सहीह (अल-अल्बानी)

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया

“वित्र, आखिर रात में एक रकअत है”
📚-(सहीह मुस्लिम, हदीस-752)

*(5). तीन रकत वित्र पढ़ने का तरीका*

तीन रकअत वित्र पढ़ने के दो (2) तरीके है:

पहला तरीका:

एक ये है की तीन रकअत के वित्र में किसी रकअत में न बैठे सिवाए आखरी रकअत में. इसका मतलब दूसरे रकअत में तशहुद के लिए बिना बैठे ही उठ जाना
है या ऐसा कह सकते है की दूसरी रकअत के सज्दे के बाद ही उठ जाना है.
दलील
हज़रात आयेशा (R.A) फरमाती है

रसूल अल्लाह (ﷺ) तीन रकअत वित्र पढ़ते थे और वो आखरी रकअत के अलावा किसी रकअत में नहीं बैठते थे.
📚-(अल-नसाई, 3/234) (अल-बैहक़ी, 3/31)

दूसरा तरीका

दूसरा तरीका ये है की 2 रकअत पढ़ कर सलाम फेरे है और फिर एक रकअत अलग से पढ़ना है.
दलील
इब्न उमर (R.A.) रिवायत करते है:

की वो दो रकअत को एक रकअत से तस्लीम (सलाम) के साथ अलग किया करते थे, और वो फरमाते है की ऐसा रसूल अल्लाह (ﷺ) किया करते थे.
📚-(इब्ने हिब्बान – 2435), (इब्न हजर सईद इन अल-फतह – 2/482):इस्नाद-सहीह

*(6). पांच या सात रकअत वित्र*

लेकिन अगर कोई पांच या सात रकअत वित्र पढ़े तो वो मुसलसल होनी चाहिए और सिर्फ आखरी रकअत में तशहुद पढ़े और फिर तस्लीम (सलाम) कहे
दलील

हज़रात आयशा (R.A) रिवायत करती है

रसूल अल्लाह (ﷺ) रात को तरह (13) रकअत पढ़ा करते थे जिसमे वो पांच रकअत वित्र पढ़ते थे जिसमे वो आखरी रकअत के अलावा किसी रकअत में
न बैठते थे.
📚-(मुस्लिम, 737)

हजरत उम्मे सलमह (R.A) रिवायत करती है

रसूल अल्लाह (ﷺ) पांच या साथ रकअत वित्र पढ़ते थे और वो उसके बीच कोई सलाम या अल्फ़ाज़ से अलग नहीं करते थे.
📚-(मुस्नद अहमद, 6/290), (अल-नसाई, 1714), अल-नववी सईद: इस्नाद-जय्यिद. अल-फतह अल-रब्बानी, 2/297.

*(7). नौ (9) रकत वित्र*

अगर वो नौ (9) रकअत वित्र पढ़ना चाहे तो किसी भी रकअत में न बैठ सिवाए आठवे रकअत में. आंठवे रकअत में बैठ कर सिर्फ तशहुद कहे और सलाम न कहे और फिर वो खड़ा हो जाये. फिर 9 रकअत में तशहुद और सलाम दोनों पढ़ कर नमाज़ ख़त्म करे.

*(8). ग्यारा रकत वित्र*

अगर वो 11 रकअत वित्र पढ़ना चाहे तो हर 2 रकअत में सलाम फेरे और फिर आखिर में 1 रकअत पढ़े.

*(9). वित्र को मगरिब की तरह न बनाना*

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया की

वित्र को तीन रकअत मगरिब के तरह न बनाओ.
📚-(अल-हाकिम, 1/403), (अल-बैहक़ी, 3/31), (अल-दारकुतनी, P.172), अल-हाफ़िज़ इब्न हजर सईद इन फतह अल-बारी (4/301):

और इस हदीस का जवाब दूसरी हदीस देती है की वित्र को कैसे मगरिब के तरह न बनाया जाये.

हज़रात आयशा (R.A) फरमाती हैं की:

रसूलअल्लाह (ﷺ) तीन रकअत वित्र पढ़ते थे और वो आखरी रकअत के अलावा किसी रकअत में नहीं बैठते थे.
📚-(अल-नसाई, 3/234), (अल-बैहक़ी, 3/31), (अल-नववी सईद इन अल-मजमू (4/7):इमाम निसाई ने इसको हसन और इमाम बैहकी ने सही कहा है

इस हदीस से पता चला की वित्र को कैसे मगरिब के तरह न बनाया जाये जिससे रसूल अल्लाह (ﷺ) ने मना फ़रमाया है.

*(10). दुआ ए क़ुनूत*

अल्लाहुम्मा इहदिनी फीमेन हदयता व ‘आफिनि फीमेन ‘आफयता व तवल्ली फीमेन तावल्लयता व बारीक ली फीमे अतयता, व किनी शर्करा मा कादयता , फ इन्नका तक़दी व ला युकदा ‘अलैक, व इन्नहु ला यढिल्लू मन वालयता (व ला येज़्ज़ु मन ‘आदायता,) तबारकता रब्बना व तआलायता.
📚-(अबू दावूद, 1213), (अल-नसाई, 1725), (अल-अल्बानी इन अल-इवा’, 429)-सहीह

See Image : क़ुनूत-ए-नाज़िला (1)

तर्जुमा: या अल्लाह! मुझे हिदायत देकर इन लोगों में शामिल फरमा जिन्हें तूने रुश्द और हिदायत से नवाज़ा है और मुझे आफ़ियत देकर इन लोगों में शामिल फार्मा जिन्हें तूने आफ़ियत बखशी है और जिन लोगों को तूने अपना दोस्त बनाया है इन में मुझे भी शामिल कर के अपना दोस्त बनाले. जो कुछ तूने मुझे अता फ़रमाया है इस में मेरे लिए बरकत डाल दे और जिस शरर और बुराई का तूने फैसला फ़रमाया है इस से मुझे मेहफ़ूज़ रख और बचाले.

यक़ीनन तुहि फैसला सादिर फरमाता है तेरे खिलाफ फैसला सादिर नहीं किया जा सकता और जिसका तू दोस्त बना वो कभी ज़लील और खुवार और रुस्वा नहीं हो सकता और वो शक़्स इज़्ज़त नहीं पा सकता जिसे तू दुश्मन कहे, ऐ हमारे रब! तू (बड़ा) ही बरकत वाला और बुलन्द और बाला है’. जो ब्रैकेट्स में दुआ है (व ला येज़्ज़ु मन ‘आदायता,) वो सुनें अबू दाऊद की सहीह हदीस में है लेकिन ये अल्फ़ाज़ सुनें निसाई की सहीह हदीस में नहीं है. तो इसलिए जो दुआ के इज़ाफ़ी अल्फ़ाज़ है वो पढ़ भी सकते है और नहीं भी, दोनों तरीके सहीह है.

*(11). दुआ ए क़ुनूत रुकू से पहले या रुकू के बाद में?*

इस मुअलमले में उलेमाओ में इख्तिलाफ है. लेकिन अक्सर उलेमाओ का ये कहना है की दुआ ए क़ुनूत रुकू से पहले और रुकू के बाद दोनों कर सकते है और दोनों की इजाज़त है.

लेकिन बेहतर रहे ये है की दुआ ए क़ुनूत रुकू से पहले किया जाये. ये इसलिए क्युकी कोई भी सहीह /हसन रिवायत नहीं है जहा रसूल अल्लाह या सहाबा दुआए क़ुनूत वित्र में रुकू के बाद क़ुनूत पढ़ा करते थे. बल्कि सहाबाओ से ये साबित है की वो रुकू से पहले क़ुनूत ए वित्र पढ़ा करते थे:

असीम अहवाल रिवायत करते है की

मैंने अनस बिन मालिक से क़ुनूत के बारे मे पूछा. “अनस (R.A) ने जवाब दिया, “बिल्कुल (ये पढ़ा जाता था)”. मैंने पूछा की रुकू से पहले या रुकू के बाद? अनस (R.A) ने जवाब दिया: ‘रुकू से पहले’. मैंने कहा फुला ने कहा है की अपने उनसे बताया है की रुकू के बाद है. अनस (R.A.) ने फ़रमाया, ‘उसने झूट (हिजाज़ी DIALECT के मुताबिक उसे गलती लगी) कहा’. अल्लाह के रसूल ने क़ुनूत रुकू के बाद एक महीने के लिए पढ़ा था. अनस (R.A) फरमाते है जब मुशरीकीन ने 70 सहाबा किराम को क़तल कर दिया तो ”नबी (ﷺ) ने एक माह (30 DAYS) क़ुनूत फरमाए जिसमे आप (ﷺ) उन (सहाबा के क़ातिल मुशरीको) पर बाद्दुआ करते रहे”.
📚-(सहीह बुखारी, भाग: 2, बी:16, न०.116), (अबू अवानः (2/285), (दारमी (1/374), (शरह मानी AL-AATHAAR OF TAHAAWEE (1/143), (सुनन अल-कुबरा लिल बैहकी(2/207) मुस्नद अहमद(3/167.)

उबय्य इब्न काब रदीयल्लाहो अन्हु फरमाते है की

रसूल अल्लाह (ﷺ) तीन वित्र पढ़ते और दुआ ए क़ुनूत रुकू से पहले पढ़ते थे.
📚(इब्न माजाह (न०.1182), (सुनें अन-नसाई (3/235 न०.1700), (सुनन दारक़ुतनी (2/31 NO.1644), दिया MAQDISEE HAS ALSO TRANSMITTED THIS IN AL-मुख्तरः इमाम अल-अल्बानी AUTHENTICATED IT REFER TO, SAHEEH इब्न माजाह (न०.970) AND (IRWAA UL-GHALEEL (नO.462),

मुसन्नफ़ इब्न अबी शैब्याः में भी ये रिवायत दर्ज है के हज़रात अब्दुल्लाह बिन मसूद और सहाबा किराम (r.a.) क़ुनूत ए वित्र रुकू से पहले पढ़ते थे.
इब्न अबी शेबा, इसे इब्न ए तुर्कमानी और हाफिज इब्न हजर ने हसन कहा है.

*(12). रुकू के बाद वाली रिवायते*

वित्र में रुकू के बाद क़ुनूत की तमाम रिवायत ज़ईफ़ है और जो रिवायत सहीह है उनमे ये वाज़ेह नहीं है की आप का रुकू के
बाद वाला क़ुनूत, क़ुनूत वित्र था या क़ुनूत ए नाज़िला. इसलिए वित्र में क़ुनूत रुकू से पहले पढ़ा जाना चाहिए.

अल्लामा इब्न हजर (r.h.) सहीह अल बुखारी की तफ़्सीर फतह अल-बारी में कहते है, ये सारे रिवायतों को ताज्ज़ीह करने के बाद हमें ये पता चलता है की ये एक आम मामूल था की दुआ ए क़ुनूत वित्र से पहले पढ़ा जाता था. ताहम किसी खास सूरत में (जैसे मुसीबत के वक़्त) क़ुनूत रुकू से बाद पढ़ा जाता था.
📚 फतह अल बारी भाग. 1, पेज. 291

*(13). क्या दुआ ए क़ुनूत में हाथ उठाया जाये*

दुआ ए क़ुनूत वित्र में हाथ उठाने के बारे में कोई मरफ़ूअ रिवायत नहीं है लेकिन हदीस के किताबो में बाज़ सहाबा इकराम (r.a.) के आसार मिलते हैं. इस्लामी शरिया में जब कोई बात रसूल अल्लाह से न मिले और सहाबा से वो अमल मिल जाये और उस पर किसी दूसरे सहाबा का ऐतराज़ न किया हो तो उस अमल को अपनाने में कोई हर्ज नहीं.

इब्ने मसूद कहते है की

वो वित्र में अपने हाथ उठाते थे और उस के बाद उसे निचे कर -  थे.
📚-अब्दुर रज़्ज़ाक़ (4/325), सनद हसन.

क़ुनूत में हाथ उठाना उमर (r.a.) से भी साबित है.
📚अल बैहकी (2/210).सही

*अल्लाह हमें नबी सल्ललल्लाहो अलेहीवसल्लम के तरीके के मुताबिक कसरत से वित्र अदा करने की तौफीक अता फरमाए. आमीन.*

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