*......तौहीद और शिर्क......*

*......तौहीद और शिर्क......*

सवाल: *तौहीद किसे कहते हैं?*

जवाब: *अल्लाह को एक मानना और उसकी ज़ात व सिफ़ात में किसी और को शरीक न करने को तौहीद कहते हैं।*

तौहीद की 3 किस्में होती हैं- तौहीदे रबूबियत(ज़ात), तौहीदे वहयत(इबादत) और तौहीदे सिफ़ात।

1- *तौहीदे रबुबियत(ज़ात):-*
तौहीदे रबुबियत का मतलब ये है कि तमाम कायनात का ख़ालिक, मालिक और राज़िक सिर्फ अल्लाह तआला ही है। तौहीद की इस किस्म को नास्तिक लोगों के अलावा वाकी सब लोग मानते हैं यहाँ तक कि मक्का के मुशरिक भी मानते रहे जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरआन में मुशरेकीन के क़ौल नकल किये हैं मसलन फ़रमाया कि
*ऐ पैग़म्बर ﷺ  पूछिये कि तुमको ज़मीन में रिज्क़ कौन देता है या (तुम्हारे) कानों और आँखों का मालिक कौन है और बेजान से जानदार और जानदार से बेजान कौन पैदा करता है और दुनिया के कामों का इन्तेजाम कौन करता है? (ये लोग) झट से कह देंगे कि अल्लाह (यानि ये सब काम करने वाला अल्लाह है)* Reference:कुरआन(सूरह-10, आयत-21)

दुसरे मक़ाम पे फ़रमाया है कि-
*अगर आप ﷺ  इनसे पूछें कि आसमान व ज़मीन का खालिक़ (पैदा करने वाला) कौन है? तो यकीनन (ये लोग) यही कहेंगे कि अल्लाह (ने ये सब पैदा किया है)* Reference:कुरआन(सूरह-39, आयत-38)

एक और मक़ाम पे फ़रमाया है कि-
*अगर आप (स.अ.व.) इनसे पूछें कि ज़मीन और ज़मीन में जो कुछ है, ये सब किसका माल है? सातों आसमान और अर्शे अज़ीम का मालिक कौन है? हर चीज़ की बादशाही किसके हाथ में है और जो सबको पनाह देता है और जिसके मुक़ाबिल कोई पनाह देने वाला नहीं इन सब के जवाब में ये यही कहेंगे कि अल्लाह यानि ये सारे काम अल्लाह ही के हैं।* Reference:कुरआन(सूरह-23, आयत 84-89)

2- *तौहीदे वहयत(इबादत):-*
तौहीदे वहयत का मतलब ये है कि तमाम क़िस्म की इबादत का हक़ सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला के लिए है जितनी भी इबादत हैं सब अल्लाह के लिए की जायें। जैसे नमाज़, रोज़ा, हज़, ज़कात और दस्त बस्ता (हाथ बांधकर) खड़े होना, दुआ व इल्तेजा करना, तवाफ़ करना वगैरह ये सब इबादत हैं अगर इनमे से कोई भी काम हम अल्लाह के अलावा किसी और के लिए करें तो ये *तौहीदे वहयत(इबादत)* में शिर्क हो जायेगा।

3- *तौहीदे सिफ़ात:-*
तौहीदे सिफ़ात का मतलब ये है कि कुरआन व हदीस में अल्लाह की जो भी सिफ़ात बयान की गयी हैं वो सारी सिफ़ात अल्लाह में मानें और अल्लाह की सिफ़ात में किसी और को शरीक न करें।
जैसे कि *दूर से सुन लेना, हर भाषा समझ लेना, नफ़ा व नुकसान देना, दिलों की बातें जान लेना, हर जगह मदद करना, सारी दुनिया को एक ही वक़्त में देखते रहना, औलाद देना, मौत व ज़िन्दगी देना, हाज़त रवाई और मुश्किल कुशाई करना वगैरह* ये सब अल्लाह की सिफ़ात हैं बिल्फर्ज़ अगर इन में से कोई भी सिफ़्त हम अल्लाह के अलावा किसी और में मान लें तो ये तौहीदे सिफ़ात में शिर्क हो जायेगा ।

सवाल:- *शिर्क किसे कहते हैं?*
जवाब:- *अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात में किसी और को शरीक करने को शिर्क कहते हैं।*

शिर्क के नुक्सानात तो बहुत ही ज्यादा हैं बल्कि अगर ये कह दिया जाये कि मुशरिक (शिर्क करने वाले) की बख्शिश नहीं होगी तो कुछ ग़लत नहीं होगा क्योंकि अल्लाह तआला कुरआन में फ़रमाता है-
*बेशक़ अल्लाह शिर्क (करने वाले) को कभी माफ़ नहीं करता और इसके अलावा जिसको चाहता है बख्श देता है।* Reference:कुरआन(सूरह- 4, आयत-48)

एक और मक़ाम पे अल्लाह फरमाता है कि-
*बेशक़ अल्लाह उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगा जो अल्लाह के साथ शिर्क करता है इसके अलावा जिसको चाहे बख्श देगा और जो अल्लाह के साथ (किसी और को) शरीक ठहराये वो गुमराही में बहुत दूर निकल गया।* Reference:कुरआन(सूरह-4, आयत-116)

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