๐ *เคเค़ाเคจ เคต เค เค़ाเคฎเคค เคเคฐเคจे เคा เคธुเคจ्เคจเคค เคค़เคฐीเค़เคน*
*بسم الله الرحمن الرحيم
🔍 *आज़ान व अक़ामत करने का सुन्नत त़रीक़ह*
🔍 *नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो तआला अन्ह को जो आज़ान व अक़ामत के कलिमात सिखाये जिसे अब्दुल्लाह बिन ज़ैद व हज़रते उमर रज़ियल्लाहो तआला अन्हुम ने ख्वाब मे देखा था वह यह है*
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🔍 *आज़ान के अल्फाज़*
अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु
अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु
अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह,अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह
अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह ,अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह
हय्या अलस्सलाति, हय्या अलस्सलाति
हय्या अलल् फलाहि,हय्या अलल् फलाहि
अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु
लाइलाहा इल्लल्लाह
सुनन अबू दाऊद, 499,हसन,इब्ने माजह 706 ,तिर्मिज़ी 189,इब्ने खुज़ैमह 361
🔍 *फज्र की आज़ान मे 2 बार "अस्सलातु खैरुम् मिनन् नौम" कहना*
◼हज़रते अबू महज़ूरह रज़ियल्लाहो तआला अन्ह नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से रिवायत करते हैं ,इसमें है कि *अस्सलातु खैरुम् मिनन् नौमि, अस्सलातु खैरुम् मिनन् नौमि* , पहली यअनि सुबह की आज़ान मे है-सुनन अबू दाऊद 501, हसन,निसाई 634
◼हज़रते अनस रज़ियल्लाहो तआला अन्ह बयान करते हैं कि यह सुन्नत है कि जब मुअज़्ज़िन फज्र की आज़ान मे *हय्या अलल् फलाहि* कह ले तो कहे *अस्सलातु खैरुम् मिनन् नौमि*-सही इब्ने खुज़ैमह, 386,सही
🔍 *ठण्डी और बरसात की रात मे मुकम्मल आज़ान के बअद मुअज़्ज़िन कहे "अला सल्लू फिर् रिहालि" और जुमअह के दिन जब बारिश की वजह से कीचड़ हो तो मुअज़्ज़िन "हय्या अलस् सलाहि" के बजाये कहे "अस्सलातु फिर् रहालि"*
◼हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहो तआला अन्ह ने एक ठंडी और बरसात की रात मे आज़ान दी और फिर यूँ पुकार कर कह दिया कि *अला सल्लू फिर् रहालि* ( लोगों अपनी क़यामगाहों पर ही नमाज़ पढ़ लो ) फिर फरमाया नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सर्दी व बारिश की रातों मे मुअज़्ज़िन को हुक्म देते थे कि वह ऐलान कर दे कि ( अला सल्लू फिर् रहालि )-सही बुखारी 666,मुस्लिम 1600, अबू दाऊद 1063,निसाई 653
◼अब्दुल्लाह बिन हारिस बिन नौफिल ने कहा कि हमें एक दिन इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहो अन्हुमा ने जब बारिश की वजह से कीचड़ हो रही थी खुत़्बह सुनाया फिर मुअज़्ज़िन को हुक्म दिया और जब वह *हय्या अलस् सलाहि* पर पहुँचा तो आपने फरमाया आज यूँ पुकार दो कि *अस्सलातु फिर् रहालि* ( नमाज़ अपनी क़यामगाहों पर पढ़ लो ) लोग एक दूसरे को देखने लगे , जैसे इसको उन्होंने नाजायज़ समझा , इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहो अन्हुमा ने फरमाया कि ऐसा मअलूम होता है कि तुमने शायद इसको बुरा जाना है, ऐसा तो मुझसे बेहतर ज़ात यअनि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने किया था , बैशक जुमअह वाजिब है मगर मैंने यह पसंद नहीं किया कि *हय्या अलस् सलाहि* कहकर तुम्हें बाहर निकालूँ , अब्दुल्लाह बिन हारिस ने कहा कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहो अन्हुमा ने फरमाया कि मुझे अच्छा मअलूम नहीं हुआ कि तुम्हें गुनहगार करूँ और तुम इस हालत मे आओ कि तुम मिट्टी मे घुटनों तक आलूदह हो गये हो-सही बुखारी 668
🔍 *अक़ामत के अल्फाज़*
अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु
अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह,अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह ,
हय्या अलस्सलाति,हय्या अलल् फलाहि,
क़द्क़ामतिस् सलातु, क़द्क़ामतिस् सलातु
अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु
लाइलाहा इल्लल्लाह
सुनन अबू दाऊद, 499,हसन,इब्ने माजह 706 ,तिर्मिज़ी 189,इब्ने खुज़ैमह 361
🔍 *आज़ान व अक़ामत के कलिमात को दुहराने का त़रीक़ह*
◼ हज़रते उमर बिन खत़्त़ाब रज़ियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया जब मुअज़्ज़िन
*अल्लाहु अकबरु,अल्लाहु अकबरु* कहे तो तुम मे से ( हर ) एक *अल्लाहु अकबरु,अल्लाहु अकबरु* कहे फिर वह ( मुअज़्ज़िन ) कहे ,
*अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाहो* तो वह भी कहे *अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाहो*
फिर *अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाहि* कहे तो वह भी *अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाहि* कहे ,
फिर वह *हय्या अलस् सलाति* कहे तो वह *लाहौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि* कहे ,
फिर मुअज़्ज़िन *हय्या अलल् फलाहि* कहे तो वह *लाहौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि* कहे ,
फिर *अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु* कहे तो वह भी *अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु* कहे ,
फिर वह *लाइलाहा इल्लल्लाहो* कहे तो वह भी अपने दिल से *लाइलाहा इल्लल्लाहो* कहे
तो वह जन्नत मे दाखिल होगा -सही मुस्लिम 385 ( 850 )
◼आज़ान के कलिमात दुहराते हुए कलिमह शहादत के बअद यह दुआ पढ़े - *अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू लाशरीका लहू वअन्ना मुहम्मदन् अब्दुहू वरसूलुहु , रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन् वबिमुहम्मदिर् रसूलन् वबिल् इस्लामि दीनन्*-सही मुस्लिम 386 ( 851 ),अबू दाऊद 525,इब्ने माजह 721
◼ सही बुखारी हदीस नम्बर 916 में अक़ामत को भी अज़ान कहा गया है , इसलिए अक़ामत मे भी ऐसे ही दुहराना चाहिए ।
🔍 *तरजीई आज़ान यअनि जो आज़ान नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रते अबू महज़ूरह रज़ियल्लाहो तआला अन्ह को सिखलाई थी का तरीक़ह*
◼ हज़रते अबू महज़ूरह रज़ियल्लाहो तआला अन्ह को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आज़ान सिखलाई जिसमें आज़ान के 19 और अक़ामत के 17 कलिमात सिखलाए थे , वह यह है-
अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबर
अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह,अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह
अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह
फिर दुबारह यही कहे-
अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह,अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह
अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह
फिर कहे -
हय्या अलस्सलाहि हय्या अलस्सलाहि
हय्या अलल् फलाहि हय्या अलल् फलाहि
अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबरु
लाइलाहा इल्लल्लाह
-सुनन अबू दाऊद 502, सही मुस्लिम 379
🔍 *तरजीई अक़ामत का तरीक़ह*
◼ अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबर
अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह,अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह
अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह
हय्या अलस्सलाहि हय्या अलस्सलाहि
हय्या अलल् फलाहि हय्या अलल् फलाहि
क़द्क़ामतिस्सलाह क़द्क़ामतिस्सलाह
अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबरु
लाइलाहा इल्लल्लाह
-सुनन अबू दाऊद 502, सही मुस्लिम 379
◼तरजीई आज़ान देने का तरीक़ह यह है कि पहली बार जब ( अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह अश्हदु अल् लाइलाहा इल्लल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह ) कहे तो कुछ धीमी आवाज़ से कहे, दुबारा जब यह कहे तो बुलन्द आवाज़ से कहे, की दलील -503 , सही, निसाई 633, इब्ने माजह 708
🔍 *आज़ान के बअद पढ़ी जाने वाली दुआ*
◼मुअज़्ज़िन की आज़ान के कलिमात दुहराने के बअद नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर दुरूद भेजे फिर फिर नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिए वसीलह माँगे यानि वसीलह वाली दुआ पढ़े , की दलील -सही मुस्लिम 384 ( 849 ),अबू दाऊद 523,निसाई 677,
◼ *अल्लाहुम्मा रब्बहाज़िहिद् दअवतित् ताम्मति वस्सलातिल् क़ाइमति आति मुहम्मदन् अल्वसीलता वल्फज़ीलता वब्अष्हु मक़ामन् महमूदन् अल्लज़ी वअत्तहू*- सही बुखारी 614,अबू दाऊद 529,इब्ने माजह 722,तिर्मिज़ी 211,निसाई 679,
◼ आज़ान व अक़ामत के बीच मे दुआ करे क्योंकि आज़ान व अक़ामत के माबैन दुआ रद्द नहीं की जाती-सुनन अबू दाऊद 521, सही, इब्ने खुज़ैमह 426,427
🔍 *आज़ान व अक़ामत के दीगर मसायल*
◼ हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो तआला अन्ह, आज़ान के लिए वुज़ू करते थे-सुनन अबू दाऊद 3055,इस्नादह हसन
◼आज़ान खड़े होकर देना चाहिए, क्योंकि नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया, बिलाल ! उठ और नमाज़ के लिए आज़ान दे-सही बुखारी 604
◼लाउडस्पीकर न हो तो ऊँचाई पर चढ़ कर आज़ान देना, क्योंकि हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो तआला अन्ह , बनू नज्जार की एक खातून के ऊँचे मकान पर चढ़ कर आज़ान देते थे और आज़ान से पहले यह कहते थे- *अल्लहुम्मा इन्नी अहमदुका , अस्तईनुका अला क़ुरैशिन् अय्युंक़ीमु दीनका* ( ऐ अल्लाह मैं तेरी तअरीफ करता हूँ और क़ुरैश पर तुझ ही से मदद चाहता हूँ कि वह तेरे दीन को क़ायम करें ) -सुनन अबू दाऊद 519, हसन ,
◼बुलन्द आवाज़ से आज़ान देना चाहिए -सही बुखारी 609
◼आज़ान अच्छी आवाज़ मे करनी चाहिए क्योंकि नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हज़रते महज़ूरह रज़ियल्लाहो तआला अन्ह की आवाज़ पसंद आई लिहाज़ा आपने उन्हें आज़ान सिखाई-सही इब्ने खुज़ैमह 377,सही मुस्लिम 387,389, अबू दाऊद 500,505,इब्ने माजह 708
◼ हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो तआला अन्ह, हय्या अलस्सलाह व हय्या अलल् फलाह कहते वक़्त अपनी गर्दन को दायें बायें फिराते थे-सुनन अबू दाऊद 520,सही मुस्लिम 503
◼हय्या अलस् सलाहि और हय्या अलल् फलाहि कहते हुए चेहरे को घुमाना व अपनी उँगलियाँ अपने कानों मे आज़ान के दौरान दाखिल करना-सुनन इब्ने माजह 711, हसन, तिर्मिज़ी 197
◼आज़ान अव्वल वक़्त से देर नहीं करनी चाहिए, अक़ामत मे कभी कभार थोड़ी ताखैर की गुन्जाइश है की दलील -सुनन इब्ने माजह 713, इस्नादह ज़ईफ, दीगर मुहक़्क़िक़ीन ने इसे शवाहिद की बिना पर हसन क़रार दिया है ( इर्वाउल्ग़लील 227 )
◼नमाज़ क़ज़ा हो जाय फिर भी आज़ान व अक़ामत के साथ नमाज़ पढ़नी चाहिए -सही बुखारी 595
◼किसी मस्जिद मे जमाअत से नमाज़ हो चुकी हो तो उसी मस्जिद मे दुबारा उसी वक़्त की नमाज़ अदा करने के लिए दुबारा आज़ान व अक़ामत करके जमाअत से नमाज़ अदा की जा सकती है क्योंकि हज़रते अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहो तआला अन्ह एक ऐसी मस्जिद मे हाज़िर हुए जहाँ नमाज़ हो चुकी थी आपने फिर आज़ान दी अक़ामत कही और जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ी -सही बुखारी क़ब्ल अल् हदीस 645
◼अकेला आदमी बकरियाँ चराने वाला हो उसे भी आज़ान कहनी चाहिए -सुनन निसाई 667, सही, अबू दाऊद 1203,
◼अकेला आदमी नमाज़ पढ़े उसे भी अक़ामत कहनी चाहिए -सुनन अबू दाऊद 861, सही, निसाई 668,
◼सेहरी के लिए भी आज़ान देनी चाहिए -सही बुखारी 622,623
◼हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो तआला अन्ह और हज़रते इब्ने उम्मे मकतूम रज़ियल्लाहो तआला अन्ह की आज़ान मे इतना वक़्फह था कि एक ( हज़रते बिलाल रज़ियल्लाहो अन्ह ) उतरता तो दूसरा ( हज़रते इब्ने उम्मे मकतूम रज़ियल्लाहो अन्ह ) ऊपर चढ़ता- सही मुस्लिम 1092 ( 2538 )
◼आज़ान व अक़ामत के दरम्यान वक़्फह करना चाहिए क्योंकि नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया आज़ान व अक़ामत के दरम्यान नमाज़ पढ़ो फिर तीसरी बार फरमाया जो चाहे पढ़े-सही बुखारी 624
◼किसी उज़्र की वजह से अक़ामत व जमाअत के दरम्यान वक़्फह किया जा सकता है -सही बुखारी 629
◼जब अक़ामत हो जाय तो फर्ज़ नमाज़ के सिवा कोई नमाज़ नही होती -सही मुस्लिम 710
◼जब अक़ामत हो जाय तो सफ मे शामिल होने के लिए न भागे बल्कि वक़ार के साथ चलते हुए आये जो नमाज़ पा ले वह ठीक है और जो रह जाय उसे बाद मे पूरा कर ले-सही बुखारी 636
🔍 *मसनून दुआओं मे या आज़ान मे अपनी तरफ से अल्फाज़ मिलाना मना है*
◼ एक आदमी ने ज़ुहर या अस्र की आज़ान मे तष्वीब की तो हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहो तआला अन्ह फरमाने लगे मुझे यहाँ से ले चलो बिलाशुबह यह बिद्अत है-सुनन अबू दाऊद 538, हसन, तिर्मिज़ी 198
◼नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने बराअ बिन आज़िब रज़ियल्लाहो तआला अन्ह को रात को बावुज़ू होकर सोने से पहले पढ़ने की एक दुआ सिखलाई तो हज़रते बराअ रज़ियल्लाहो तआला अन्ह ने दुआ मे "बिनबिय्यका" की जगह "बिरसूलिका"पढ़ दिया तो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने "बिनबिय्यका" पढ़ने को कहा -सही बुखारी 247
🔍 *आज़ान से पहले खुदसाख्तह दुरूद पढ़ना*
आज़ान से पहले *"अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलुल्लाहि"* पढ़ना बिद्अत है,जो सवाब नहीं गुनाह है,क्योंकि इसमें नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से खिताब है और यह सीग़ह नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से आम दुरूद के वक़्त मनक़ूल नहीं है , और तहय्यात मे *"अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु"* चूँकि आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मनक़ूल है इस वजह से उस वक़्त मे पढ़ने मे कोई कबाहत नहीं ,मज़ीद बराँ इसका पढ़ने वाला इस फासिद अक़ीदे से पढ़ता है कि आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इसे बराह ए रास्त सुनते है , यह अक़ीदह फासिदह क़ुर्आन व हदीस के खिलाफ है और इस अक़ीदह से मज़कूरह खानहसाज़ दुरूद पढ़ना भी ग़ैर सही है-सूरह अल् अहज़ाब सूरह नम्बर 33 , आयत नम्बर 56 की तफसीर , तफसीर अहसनुल बयान
🔍 *आज़ान व अक़ामत का जवाब देते हुए की जाने वाली बिद्आत*
🔍 *आज़ान के दौरान अँगूठा चूमने की बिद्अत की हक़ीक़त*
📗 *दलील नम्बर 1*
हज़रते अबू बक्र रज़ियल्लाहो ताला अन्ह ने एक मुअज़्ज़िन से कल्मह
*( अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह )*
सुनकर ,अपनी शहादत वाली उँगली को चूमकर अपनी आँखों को लगाया तो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स मेरे इस प्यारे की तरह करे इसके लिए मेरी शिफाअत वाजिब होगी ।
मुस्नद फिरदौस अल अख्यार
📗 *दलील नम्बर 1 का जवाब*
मुस्नद फिरदौस में ये रिवायत सिरे से है ही नहीं, उसकी सही सनद साबित करना बहुत दूर की बात है ।
इमाम शैबानी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं ,जिस हदीस मे ( क़ुर्रतु ऐनी )
वाली इबारत है , के मुताल्लुक़ फरमाते हैं ,शेख सखावी फरमाते हैं कि यह सय्यिदिना अबू बक्र रज़ियल्लाहो ताला अन्ह वाली हदीस सही नहीं क्योंकि यह मुन्क़ेतअ भी है और इसकी सनद में रावी भी मज्होल है ।
तमीज़ अल तय्यब मिनल् खबीस 189
📗 *दलील नम्बर 2*
ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि जिसने मुअज़्ज़िन को यह कहते हुए सुना
*( अश्हदु अन्ना मुहम्मदर् रसूलुल्लाह )*
तो कहे
*( मरहबा बि हबीबी व क़ुर्रतु ऐनी मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह )*
फिर अपने अँगूठे को चूमे और अपनी आँखों से लगाये तो उसकी आँखें कभी न दुखेंगी ।
मक़ासिदे हस्नह व जा अल हक़ जिल्द नम्बर 1 सफा नम्बर 394-397
📗 *दलील नम्बर 2 का जवाब*
इमाम सखावी इस हदीस को नक़्ल करने के बाद रक़म तर्राज़ हैं ,( वला युसह्ह फिल् मर्फूअ मिन कुल्लि हाज़ा शैअ ),इस सब में से कुछ भी मर्फूअ साबित नहीं है ।
( अल् मक़ासिदुल हस्नह सफह नम्बर 384 )
📗 *दलील नम्बर 3*
- *इन्जील ए बरान्बस से दलील*
( पस आदम ने बमन्नत यह कहा कि ऐ परवरदिगार यह तहरीर मुझे मेरे हाथ की ऊँगलियों के नाखूनों पर अता फरमा, तब अल्लाह ताला ने पहले इँसान को यह तहरीर इसके दोनों अँगूठों पर अता की, दाहिने हाथ के अँगूठे के नाखून पर यह इबारत ,(लाइलाहा इल्लल्लाह ),और बाँयें हाथ के अँगूठे के नाखूनों पर यह इबारत ;( मुहम्मद रसूलुल्लाह ),तब पहले इँसान ने उन कलिमात को पिदरी मुहब्बत के साथ बोसा दिया और अपनी दोनों आँखों से मला और कहा ,मुबारक है वह दिन जिसमें कि तू दुनियाँ की तरफ आएगा ।
इँजील ए बरान्बस फस्ल 39 सफा नम्बर 106 आयत नम्बर 23-27
📗 *दलील नम्बर 3 का जवाब*
इँजील ए बरान्बस का इक़्तेबास तब मोअतबर है जब अल्लाह ताला और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से तस्दीक़ शुदा हो यानि क़ुर्आन व हदीस मे इस वाक़ये की सेहत साबित हो ।
◼ *क़द्क़ामतिस्सलाह* के जवाब मे *अक़ामहल्लाहु वअदामहा* कहने वाली रिवायत ज़ईफ है-सुनन अबू दाऊद हदीस नम्बर 528, इस्नादह ज़ईफ,
लिहाज़ा क़द्क़ामतिस्सलाह के जवाब मे क़द्क़ामतिस्सलाह ही कहना चाहिए ।
◼"अस्सलातु खैरुम् मिनन् नौम" के जवाब मे "सदक़ता वबरर्ता वबिल् हक़्का नत़क़्ता " कहना साबित नहीं है ।
◼ अक़ामत खत्म होने के बअद आसमान की तरफ इशारह करते हुए " हक़्क़ुन् लाइलाहा इल्लल्लाह" पढ़ना बिद्अत है ।
🔍 *आज़ान के बअद की दुआ मे इज़ाफह*
◼ "वल्फज़ीलता" के बअद "वद्दरजतर् रफीअता" कहना
◼"वअत्तहू" के बअद "वर्ज़ुक़्ना शफाअतहू यौमल् क़ियामति" कहना
◼इसके बअद "या अर् हमर् राहिमीन" कहना
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