देवबंदी की मोतबर किताब मे शिर्क और बिदअत और इसी की वह तालिम देते है

देवबंदी की मोतबर किताब मे शिर्क और बिदअत और इसी की वह तालिम देते है

📕अरवहे सलासा में ब्यान किया जाता है कि ।

📌 मौलवी मोईनुद्दीन सहाब हज़रत मौलाना मोहम्मद याकुब सहाब के सबसे बड़े साहब ज़ादे थे वह हज़रत मौलाना की एक करामत (जो बाद वफात वाके हुई ) ब्यान फरमाते थे के एक मरतबा नानो ता में जाडा बुखार की बहुत कसरत हुई सो जो शख्स मौलाना ( मोहम्मद याकुब ) की कब्र से मिट्टी ले जाकर बान्ध लेता उसे ही आराम हो जाता बस इस कसरत से मिट्टी ले गये जब डलवाऊं तब ही खतम कई मर्तबा डाल चुका परेशान हो कर एक दफा मौलाना की कब्र पर जा कर कहा ये साहब ज़ादे बहुत तेज़ मिज़ाज थे आप की तो करामत हो गयी और हमारी मुसीबत हो गयी याद रखो कि अगर अब के कोई अच्छा होआ तो हम मिट्टी ना डालेंगे ऐसे ही पड़े रहियो लोग जूता पहने तुम्हारे ऊपर ऐसे ही चलेंगे । बस इस दिन से फिर किसी को आराम ना हुआ ।जेसे शोहरत आराम की हुई थी वेसे ही शोहरत होगई कि अब आराम नही होता । फिर लोगो ने मिट्टी ले जाना बन्द कर दिया ।

( 📕अरवाहे सलासा सफा न० : 257 )

अशरफ अली थानवी सहाब फरमाते है :-

📌 हज़रत शाह नुर मुहम्मद साहब की शान में है सुना रहा था जब मज़ार शरीफ का ब्यान आया आप ( यानी हाजी इमदादुलल्ह ) ने फरमाया के मेरे हज़रत का एक ज्वाला हमारीद था --- बाद इनतेकाल हज़रत के मज़ार शरीफ पर अर्ज़ किया के हज़रत मे बहुत परेशान और रोटीयो का मुहताज हु कुछ दस्तगीरी फरमाये ----
हुक्म हुआ के तुम को हमारे मज़ार से दो आने या आदा आना रोज़ आना मिलेगा ।

📌 एक मरतवा में ज़्यारत मज़ार को गया वह शख्स भी हाज़िर था कुल केफियत ब्यान कर के मुझे हर रोज़ वज़ीफ़ा मुकर्रर यहां कब्र से मिला करता है ।

🔖( हशीया ) कोला वज़ीफ़ा मुकर्रर -- अकवाल यह मिन जुमला करामात के है ।---

(हवाला :- 📚 इमदादुल मुस्ताख सफा न० :- 123 )

क़ब्रों और मज़ारों से फ़ैज़ और दस्तगीरी

📌 दियो बंदियों के फ़ख़रुल मुह़द्दिसीन ख़लील अह़मद सहारनपूरी लिखते हैं. :

📌 ""अब रहा मशाइख़ की रूहानियत से इस्तिफ़ादह और उन के सीनों और क़ब्रों से बातिनी फ़ुयूज़ पहोंचना ,
सो (तो) बे शक सह़ीह़ है""

📌 (( 📚 अल मोहन्नद अलल मोफन्नद,सफा न:36))

क्या क़ब्रों मे मद्फून हस्तियाँ लोगो की फरियाद सुन सकते है ?

वह रात को दिन मे और दिन को रात में दाखिल करता है और आफताब व माहताब को उसी ने काम मे लगा दिया है ,हर एक मीयाद मुअय्यन पर चल रहा है यही है अल्लाह तुम सबका पालने वाला उसी की सल्तनत है

जिन्हें तुम उसके सिवा पुकार रहे हो , वह तो खजूर की गुठली के छिलके के भी मालिक नहीं है

अगर तुम उन्हें पुकारो तो वह तुम्हारी पुकार सुनते ही नहीं और अगर सुन भी ले तो फरियाद रसी नहीं करेंगे बल्कि क़यामत के दिन तुम्हारे इस शिर्क का साफ इनकार कर जाएंगे आपको कोई हक़ तआला जैसा खबरदार खबरें न देगा

(सूरह फातिर, सूरह नम्बर 35 आयत नम्बर 13-14)

उसी (अल्लाह) के लिए सच्ची पुकार है।

उससे हटकर जिनको वे पुकारते है, वे उनकी पुकार का कुछ भी जवाब नहीं देते। बस यह ऐसा ही होता है जैसे कोई अपने दोनों हाथ पानी की ओर इसलिए फैलाए कि वह उसके मुँह में पहुँच जाए, हालाँकि वह उसतक पहुँचनेवाला नहीं।

कुफ़्र करनेवालों की पुकार तो बस भटकने ही के लिए होती है

और ये जिन्दे और मुर्दे बराबर नहीं हो सकते, अल्लाह जिसको चाहता है सुना देता है.

और तुम इनको जो अपनी क़ब्रों में दफन हुए हैं इनको नहीं सुना सकते।

(अल क़ुरान, सुरह फातिर 35 , आयत 22 )

(अल क़ुरान, सूराह अर-रअद 13, आयत न 14)

अल्लाह इन लोगो को हिदायत दें

आमीन .....

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