*आशुरा यानी 10 मोहर्रम का रोजा सहीह असनाद अहादीस की रौशनी में*

*आशुरा यानी 10 मोहर्रम का रोजा सहीह असनाद अहादीस की रौशनी में*
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🔴 *आशुरे के रोजे की फजिलत*

*रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया"सब रोजो में अफजल रमजान के रोजा है और उसके बाद मोहर्रम का रोजा है"*
📚 *सहीह मुस्लिम हदीस-2755*
📚 *इब्ने माजा हदीस-1742(सही)*

🔴 *आशुरे का रोजा रखने का हुक्म*

*हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास रदीयल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह(ﷺ) जब मदीना शरीफ तशरीफ लाये तो यहुदीयो को आशुरे(10 मोहर्रम) का रोजा रखते हुए पाया तो लोगों ने उनसे(यहुदीयो से)उस रोजे के बारे में पूछा तो वो कहने लगे कि ये वो दिन है जिसमें अल्लाह तआला ने मूसा अलेहीस्सलाम को और(उनकी कौम) बनी इस्राईल को फिरऔन पर गल्बा अता फरमाया था तो हम उस दिन की अजमत की वजह से(10 मोहर्रम का) रोजा रखते है तो रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया कि हम तुम से ज्यादा हजरत मूसा अलेहीस्सलाम के करीब है तो आप(ﷺ)ने उस(10 मोहर्रम के) रोजे का हुक्म फरमाया।*
📚 *सहीह मुस्लिम हदीस-2656*

🔴 *दो रोजे रखना सुन्नत है*

*हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास रदीयल्लाहो अन्हो फरमाते है कि जिस वक्त रसूलुल्लाह(ﷺ)ने आशुरे(10 मोहर्रम)के दिन का रोजा रखा और उसका हुक्म फरमाया तो उन्होंने अर्ज किया कि ए अल्लाह के रसूल,इस दिन(10 मोहर्रम को)तो यहुद और नसारा ताजिम करते है तो रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया कि जब अगला साल(मोहर्रम का महीना)आयेगा तो हम (मोहर्रम की)नौवीं तारीख का भी रोजा रखेंगे(ताकि यहुदीयो की मुखालिफत हो जाये) रावी कहता है कि अगला साल आने से पहले ही आप(ﷺ)वफात पा गये।*
📚 *सहीह मुस्लिम हदीस-2666*
नोट- इस हदीस से मालूम हुआ कि मोहर्रम के दो रोजे 9 और 10 तारीख का रखना सुन्नत है अगर किसी वजह से 9 तारीख का रोजा छूट जाये तो 11 तारीख का जरूर रख ले यानी 10 और 11 का ताकि यहूदीयो की मुखालिफत हो जाये

🔴 *आशुरे के रोजे का सवाब*

*हजरत अबु कतादा अंसारी रदीयल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह(ﷺ)से आशुरा के दिन (10 मोहर्रम) के रोजे के बारे में पुछा गया तो आप(ﷺ)ने फरमाया"वो गुजिश्ता(गुजरा हुआ)एक साल के गुनाहों का कफ्फारा बन जाता है*
📚 *सहीह मुस्लिम हदीस-2747(1162)*

नोट-कुछ नासमझ मुसलमान आशुरे के रोजे के सवाब को लेकर तरह तरह के मैसेज कोपी करके भेजते है जिसमें कई सारे सवाब बताये जाते है।याद रखे यह बिल्कुल झूठ और बेबुनियादी होते है। दीन सिर्फ वहीं है जो अल्लाह के हुक्म में है और रसूलुल्लाह के फरमान में है।
अल्लाह हम सब को कहने और सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाये आमीन।

(हदीस में देखकर काफी एहतियात के साथ इस मैसेज को लिखा गया है)

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