_*{ शिर्क को समझिए पार्ट :- 1 }*_

_*{ शिर्क को समझिए पार्ट :- 1 }*_

          { Selecтiσn : Ahmαd Shαh }

क़ुरआन-ए-करीम ने जितना ज़ोर तौहीद के सच्चाई, हक़्क़ानियत, और शिर्क के रद्द पर दिया है उतना ज़ोर किसी दूसरे मसले पर नहीं दिया,
अल्लाह तआला ने शिर्क को ज़ुल्म-ए-अज़ीम क़रार दिया है:

اِنَّ الـشِّـرۡکَ لـَظـُلۡمٌ  عـَظـِیـۡمٌ

यक़ीनन शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है।

【सूरह लुक़मान १३】

क़ुरआन-ए-पाक बताता है कि तमाम अम्बिया की दावत का मरकज़ी नुक्ता(केंद्र) एक ही था: ल-इलाहा-इल्लल्लाह...यानि अल्लाह तआला के अलावा तुम्हारा कोई भी इलाह नहीं है...!

وَ مـَاۤ  اَرۡسَلـۡنَـا مِـنۡ قـَبۡـلِـکَ مِـنۡ رَّسُـوۡلٍ  اِلَّا نـُوۡحـِیۡۤ  اِلَـیۡہِ اَنَّـہٗ  لَاۤ  اِلٰہَ  اِلَّاۤ  اَنَـا فـَاعـۡبُـدُوۡنِ 

और जो पैगम्बर हमने तुमसे पहले भेजे उनकी तरफ़ यही वही भेजी कि मेरे अलावा कोई इलाह नहीं तो मेरी ही इबादत करो।

【सूरह अम्बिया २५】

अल्लाह तआला के क़ानून में शिर्क कितनी बुरी चीज़ है इस का अंदाज़ा इस बात से लगाऐ कि क़ुरआन में एक जगह अल्लाह तआला ने अठारह अम्बिया-ए-किराम अलैहिस्सलाम के नाम गिनवाने के बाद फ़रमाते हैं:

وَ لـَوۡ اَشـۡرَکُـوۡا لَحَبـِطَ عَنـۡہُمۡ  مَّا  کَـانُـوۡا  یَـعۡمـَلُـوۡنَ

अगर वह लोग भी शिर्क करते तो जो अमल वह करते थे सब बर्बाद हो जाते।

【सूरह अनाम ८८】

यानि मुशरिक का कोई अमल क़बूल नहीं होगा।

अल्लाह तआला को उसकी ज़ात के साथ किसी को शरीक ठहराना किस क़दर न-पसंद है कि ख़ुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ख़ताब करके कहा जा रहा है:

وَ لَـقَـدۡ  اُوۡحِـیَ  اِلـَیۡکَ وَ اِلَـی الـَّذِیـۡنَ مِـنۡ قَبـۡلِکَ ۚ لَئـِنۡ  اَشۡـرَکـۡتَ لَیـَحۡبَـطَـنَّ عـَمَلـُکَ وَ  لَتَـکـُوۡنَنَّ  مـِنَ  الۡخـٰسـِرِیۡن

और यह हक़ीक़त है कि तुम और तुमसे पहले तमाम पैगम्बरों से वही के ज़रिए यह बात कह दी गयी थी अगर तुमने शिर्क किया तो तुम्हारा किया कराया सब ग़ारत हो जाएगा- और तुम यक़ीनी तौर पर सख़्त नुक़सान उठाने वालों में शामिल हो जाओगे...!

【सूरह ज़ुमर ६५】

हालांकि नबी से शिर्क होना न-मुमकिन है लेकिन उम्मत को समझाने के लिए अल्लाह तआला ने यह इरशाद फ़रमाया है।

اِنَّـہٗ مـَنۡ یُّـشۡرِکۡ بِالـلّٰہِ فـَقَدۡ حَـرَّمَ الـلّٰہُ عَـلَیۡہِ الـۡجـَنَّۃَ وَ مـَاۡوٰىہُ النـَّارُ ؕ وَ مـَا لِلـظّٰلِمـِیۡنَ مِـنۡ اَنـۡصـَارٍ

यक़ीनन जो शख़्स अल्लाह के साथ शिर्क करेगा अल्लाह उस पर जन्नत हराम कर देगा और उसका ठिकाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं।

【सूरह मायदा ७२】

हजरत अब्दुल्ला इब्न मसूद रज़ि० फ़रमाते हैं कि मैंने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा कि सबसे बड़ा गुनाह कौन से हैं..?

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया:
कि तू अल्लाह तआला का शरीक ठहराये हालांकि उसी ने तुझे पैदा किया है...

【सहीह बुख़ारी ७५२०】

हजरत अबु हुरैरा रज़ि० फ़रमाते हैं कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि हर नबी कि एक ख़ास दुआ ऐसी होती है जिसको क़बूलियत का मक़ाम हासिल होता है और हर नबी ने ऐसी दुआ दुनिया के अंदर ही कर ली है लेकिन मैंने वो दुआ अभी तक नहीं की वो दुआ मैंने अपनी उम्मत की शिफ़ाअत के लिए छोड़ रखी है।

लेकिन यह दुआ किसके हक़ में क़बूल होगी....?

बताया तो वो दुआ अल्लाह तआला के हुक्म से मेरी उम्मत में से हर उस शख़्स को पहुंच सकती है जिसकी मौत इस हाल में हुई कि उसने अल्लाह तआला के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहराया।

【इब्न माजा ४३०७】

इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि मुसलमान के शिर्क में घुल मिल जाने का ख़तरा है...!

हजरत अबू दरदा रज़ि० फ़रमाते हैं मुझे मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह वसीयत कि है :
कि अल्लाह तआला के साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराना चाहे तुम टुकड़े टुकड़े कर दिये जाओ य क़त्ल कर दिये जाओ.।

【इब्न माजा ४०३४】

ख़ुलासा यह कि शिर्क सबसे बड़ा गुनाह है- यह अल्लाह तआला से बगावत है- मुशरिक हमेशा हमेशा के लिए जहन्नम का ईंधन बना रहेगा- इसके बावजूद लोग शिर्किया अक़ाइद और आमाल में मलूस हो जाते हैं- न सिर्फ़ यह, बल्कि दिल की गहराईयों से अपने आमाल को इस्लाम का हिस्सा समझते हैं- इस तमाम गुमराही की बुनियादी वजह एक है, वो यह कि आम मुसलमान समझता है कि शिर्क सिर्फ़ बुत प्रस्ती का नाम है- और इसकी वजह यह है कि इस्लाम जिन लोगों में आया वो बुत प्रस्त थे, क्योंकि वो बुत प्रस्त थे, इस लिए वो तमाम आयतें और हदीसें जिन में शिर्क की बुराई आयी है उनसे बुत प्रस्ती वाला ही शिर्क मुराद है।

इस विषय में इस धोखे का जायज़ा ले कर हक़ीक़त बयान की गयी है...!
आईये सबसे पहले यह देखते हैं कि मुशरिकीन-ए-अरब का ख़ुद अल्लाह तआला की ज़ात के बारे में क्या अक़ीदा था.?

मुशरिकी-ए-अरब का अक़ीदा अल्लाह तआला के बारे में।

क्या मुशरिकीन-ए-अरब अल्लाह तआला के वजूद से इन्कारी थे..?
यक़ीनन नहीं.!

मुशरिकीन-ए-अरब अल्लाह तआला के वजूद से इंकारी नहीं थे, वो न सिर्फ़ उसके होने के इकरारी थे बल्कि बहुत सारी चीज़ों को वो सिर्फ़ उसी की तरफ़ मनसूब करते थे जैसे मुशरिकीन-ए-अरब अल्लाह तआला को आसमानों और ज़मीन का ख़ालिक़ और राज़िक़, कायनात के उमूर को चलाने वाला, हर चीज़ का इख़्यार रखने वाला मानते थे,
देखते जाईये,

ख़ालिक़ अल्लाह.।

وَ لَئِـنۡ سَاَلـۡتَہُمۡ مـَّنۡ خَـلَقَہُمۡ  لَیَقُـوۡلُنَّ اللّٰہُ فَاَنّٰـی یُؤۡفَـکُوۡنَ

और अगर तुम उन से पूछो कि उनको किसने पैदा किया है तो कह देंगे कि अल्लाह ने, तो फिर वे कहाँ बहके फिरते हैं.?

【सूरह ज़ुख़रुफ़ ८७】

وَ لَـئِنۡ سَاَلۡتَـہُمۡ مَّـنۡ خَلـَقَ السـَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضَ لَیـَقُوۡلُنَّ  اللّٰہُ

और अगर तुम उनसे पूछो कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया तो कह देंगे अल्लाह ने

【सूरह ज़ुमर ३८】

रिज़्क़ देने वाला अल्लाह, मालिक अल्लाह, ज़िन्दगी देने वाला अल्लाह, मौत देने वाला अल्लाह, दुनिया का हर काम चलाने वाला अल्लाह।

قُـلۡ مَـنۡ یَّرۡزُقُکُـمۡ مِّـنَ السَّـمَآءِ وَ الـۡاَرۡضِ اَمـَّنۡ یَّمـۡلِکُ السـَّمۡعَ وَ الۡاَبۡصـَارَ وَ مَـنۡ یُّخـۡرِجُ الـۡحَیَّ مـِنَ الۡمَیِّـتِ وَ یُخـۡرِجُ الـۡمَیِّتَ مِـنَ الۡحـَیِّ وَ مَـنۡ یُّدَبِّـرُ الۡاَمـۡرَ ؕ فَسَـیَقُوۡلُوۡنَ اللّٰہُ ۚ فَقُـلۡ  اَفـَلَا  تَتَّقـُوۡنَ

कह दीजिए कि कौन तुमको आसमान और ज़मीन से रोज़ी देता है या कौन है जो कान पर और आँखों पर इख़्तियार रखता है और कौन बेजान में से जानदार को और जानदार में से बेजान को निकालता है और कौन मामलात का इंतिज़ाम कर रहा है, वे कहेंगे कि अल्लाह, कह दीजिए कि फिर क्यों तुम डरते नहीं।

【सूरह यूनुस ३१】

قُـلۡ لِّمـَنِ الۡاَرۡضُ وَ مـَنۡ فـِیۡہَاۤ  اِنۡ  کُنۡـتُمۡ  تَعـۡلَمُوۡنَ ۝
سَیَـقُوۡلُوۡنَ  لِلّٰہِ ؕ قـُلۡ  اَفـَلَا  تَـذَکَّـرُوۡنَ ۝ قـُلۡ مَـنۡ رَّبُّ السـَّمٰوٰتِ السَّبۡـعِ وَ رَبُّ الۡعـَرۡشِ الۡـعَظِیۡم ِ۝ سَیَـقُوۡلُوۡنَ  لِلّٰہِ ؕ قُـلۡ  اَفـَلَا تَتَّـقُوۡنَ ۝ قـُلۡ مَـنۡۢ بِـیَدِہٖ مَلَکـُوۡتُ کُـلِّ شـَیۡءٍ وَّ ہُوَ یُـجِیۡرُ وَ لَا یُـجَارُ عـَلَیۡہِ  اِنۡ کُنۡتُـمۡ تَعـۡلَمُوۡنَ ۝ سَیـَقُوۡلُوۡنَ لِلّٰہِ ؕ قـُلۡ فـَاَنّٰی تُسـۡحَرُوۡنَ ۝

कहो, "यह ज़मीन  और जो भी इस में आबाद है, वे किसके हैं, बताओ अगर तुम जानते हो?"०
वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह के!" कहो, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते ?"०

कहो, "सातों आसमानों का मालिक और अर्श-ए-अज़ीम का मालिक कौन है ?"०

वे कहेंगे, "सब अल्लाह के हैं।" कहो, "फिर डर क्यों नहीं रखते ?"०

कहो, "हर चीज़ की बादशाही किस के हाथ में है, वह  बचाता है और उससे कोई बचाने वाला नहीं, बताओ अगर तुम जानते हो ?"०

वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह की।" कहो, "फिर कहाँ से तुम पर जादू चल जाता है?"०

【सूरह मोमीनून  ८४,८५,८६,८७,८८,८९】

इन आयतों से मालूम होता है कि मुशरिकीन-ए-अरब अल्लाह तआला को मानते थे, यहीं से यह बात भी समझ आती है कि वो बुतों को अल्लाह नहीं मानते थे, सवाल यह है कि जब वो बुतों को अल्लाह नहीं मानते थे तो फिर वो बुतों की पूजा क्यों करते थे.? दर-हक़ीक़त बुतों को वो अल्लाह तआला तक पहुंचने का वसीला समझते थे उनका ज़हन पूरा का पूरा किसी वास्ते से अल्लाह तआला से जुड़ने का तलबगार था,
इसी लिए वो कहते थे, जिसका नक्शा क़ुरआन खींचता है:

وَ الـَّذِیۡنَ اتَّـخَذُوۡا مـِنۡ دُوۡنِہٖۤ  اَوۡلِیـَآءَ ۘ مَا نَعۡـبُدُہُمۡ  اِلَّا لِیُـقَرِّبُوۡنَاۤ  اِلَی اللّٰہِ  زُلـۡفٰی

और जिन लोगो ने उस (अल्लाह) के अलावा और दोस्त बनाये हैं, कहते हैं कि हम इनकी इस लिए इबादत करते हैं कि हमको अल्लाह के क़रीबी बना दें,

【सूरह ज़ुमर ३】

وَ یَعۡبُـدُوۡنَ مـِنۡ دُوۡنِ اللّٰہِ مَا لَا یَضـُرُّہُمۡ وَ لَا یَنۡفَـعُہُمۡ وَ یَقـُوۡلُوۡنَ ہٰۤـؤُلَآءِ شُفَـعَآؤُنَا عِنۡـدَ اللّٰہِ

और यह लोग अल्लाह के अलावा ऐसी चीज़ों की इबादत करते हैं जो न उनका कुछ बिगाड़ सकती हैं और न कुछ भला ही कर सकती हैं और कहते हैं कि यह अल्लाह के पास हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं.!

【सूरह यूनुस १८】...
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☞जारी है.....⇝⇝⇝ अगला पोस्ट जल्द ही इंशा अल्लाह।

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